الصهيل الحرّ

الصهيل الحرّ

إليك عزيزي محمود درويش في ذكرى رحيلك التاسعة, أقول:

أبت القصيدةُ..

إلا نعيَ..

فارسِها…

هطلتْ..

دموعاً..

وضاقت…

بالمدى ..

هِمَمُ.

أحقّا… كنتَ..

ثمّ.. مضيتَ؟

وتركتَ…

في وقعِ..

الجوى..

سُقَمُ.

فلسطينُ..

التي… سكنتكَ..

باتتْ..

ترتّلُ.. حزنهَا…

حين..

احتضنتكَ…

فكانت… للعلى…

قِممُ.

في الموتِ…

نحنُ ..

قبيلةٌ..

أولى..

ريتا ..تئنّ..

وتنحو ..

صوبَ..

صومعةٍ..

والبندقيةُ ..

صارت..

للهوى..

شَممُ.

مذاقٌ.. مرّ..

في..

هذا.. الرّحيل..

في.. هذا..

الهوى..

أسمعتَ ..

شعركَ..

للغريب..

وللصديق…

” ومن به صممُ”.

كنتَ..

في كل..

الزوايا..

“والغريبُ .. أخو الغريب”..

,أنا الطريدُ…..

أنا العنيدُ..

المرّ.. أنا….

الجمال..

أنا..

العلمُ.

الوسوم
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